बड़े बेदर्द हो साथी
तुझे चाहत कैसे दिखाऊँ मैं
तुम आजमाते हो बहुत
और कितना मुस्कुराऊँ मैं
तेरी यादों में रातें
कटती हैं मनहूस सी
तेरी चाहत से दोस्ती
और कितनी निभाऊँ मैं
आफ़ताब सी मुस्कराहट से
पिरोती हो तुम मोती बहुत
उनमें मैं कुछ पाउँगा
कब तक दिल समझाऊँ मैं
लगते तो हो हाफ़िज़ मेरे
पर हो बहुत संगदिल सनम
तेरी एक झलक के लिए
कितने लोगों को सताऊं मैं
कुछ तो समझो दर्द मेरा
ओ मेरे बेदर्द सनम
और क्या आकर तेरे
घर के आगे चिल्लाऊँ मैं

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