रविवार, 6 सितंबर 2015

हुस्न और इश्क

हुस्न जब इश्क की आवाज बने
उसी सूरत में वो मुमताज बने
चाहनें वालों में जब ना हो ये ज़ज्बा
कैसे मुहब्बतों का हँसी ताज बने।
हद से जो गुजर जाए वो ही प्यार बने
नहीं तो कोई किसी का यहाँ क्यूँ यार बने
नफ़े नुकसान की जो सोचते रहें हरदम
उल्फतों के भी फिर तो यहाँ बाजार बने।
नफ़रतों की हरदम यहाँ दीवार बने
प्यार सदियों से सफर में पतवार बने
मिलते हैं जब दिलों से दिल सबके
जिन्दगी मोतियों का हार बने।

शिशिर “मधुकर”

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