सूरज को तो जैसे तैसे ढो लेते है
पर चाँद संभले नहीं संभलता है
रातभर कतरा कतरा कंबख्त
तेरी यादे जहन पर मलता है
डरावनी परछाईयों पर नाचता
काला सा चिराग ख़लता है
बुझी आँखों के कोनों में से
उम्मीदों का धुआ निकलता है
नींद को कुरेदकर मनहूस सपना
बेवजह करवट बदलता है
और जज़बातों का बेगुनाह शोर
सिसकती ख़ामोशी में पलता है
थका हारा भोर का तारा
रोज़ फिर सूरज से मिलता है
तनहा रात का साथी मेरा, शायद
मेरी फरियाद कर ही ढलता है
– अमोल गिरीश बक्षी
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