मंगलवार, 15 सितंबर 2015

ग़ज़ल-(मात्रिक वहर )

सरकारी माल का निजी इस्तेमाल तो आम हो गया है I
गाड़ी कंप्यूटर तो मानो उन के नाम हो गया है II

मानव की फितरत से ही तो पर्वत भी हैं ढह रहे ,
भगवान् के नाम तो यूं ही झूठा इल्जाम हो गया है I

इश्क तो हम सब को सिखाता है जिंदगी का फलसफ़ा पर,
इसमें मरने वालों से यूं ही बदनाम हो गया है I

जनता की कठिनाइयाँ हल वो नेता करेंगे क्या ,
टांग औरों की खींचना ही जिनका अब काम हो गया है I

भ्रष्टाचार जड़ों में गहरा है समाया इस कद्र की ,
बेचारे मुफलिस का जीना ही हराम हो गया है I

बोझ अपने वादों का साहिल तक ढोता रहा ‘कंवर’
भान भी न हुआ कब का किस्सा-ए-इश्क तमाम हो गया है I

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