गुरुवार, 10 सितंबर 2015

धरती पुत्र

चाक समय का चलता रहा !

उम्मीदों के बो दिए बीज ,
निराई हुई ,गुड़ाई हुई ,
समय पर खाद जरूरी था ,
नन्हा बिरवा उगने लगा !
चाक मेहनत का चलने लगा !!

खून पसीने से सींचा खेत ,
मवेशियों से रात भर रखाया गया ,
दुनिया जब सोई थी बेखबर ,
हरखू भैरवी गाने लगा !
चाक मेहनत का चलने लगा !!

ज्वारे खेतों में लहलहा उठे ,
मेहनत के फल चहूँ ओर दिखे ,
सोने सी फसल हुई है ,
दिल रंगोली सजाने लगा !
चाक मेहनत का चलने लगा !!

अचानक आसमां का मिजाज बिगड़ा ,
गंगा जमुना बहाने लगा ,
सारी मेहनत पर पानी फिर गया ,
धरती पुत्र कलपने लगा !
किसान आंसू बहाने लगा !!

चाक समय का चलता रहा !!

– डॉ दीपिका शर्मा

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