ग़ज़ल
वो सपनों का सौदागर है
मेरे दिल के जो अन्दर है||
टूट न जाये दिल यह नाज़ुक
जिसमें रहता वो दिलवर है||
रोज़ बनाता नए बहाने
फिर भी मेरा वो रहबर है||
मैं हूँ उसमें वो है मुझमें
इस बात की उसे ख़बर है||
स्वार्थ नहीं “शकुंत” चाहत में
प्यार नहीं होता कहकर है||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

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