मृदंग आज मंद क्यों निश्वाश हैं रणभेरिया
मन हुए अपंग क्यों सहसा चली हैं गोलियां
रक्त पिपासा बढ़ी अज्ञानता सर पे चढ़ी
अट्टहासों से युक्त कैसी दुर्मति की हेकड़ी है
अश्त्र है न शस्त्र है ये रण का कैसा चित्र है
सर्वत्र ही फैला हुआ जीवाश्म और बस रक्त है
रक्त का मिश्रण हो कर्माश्रित या धर्माश्रित,
प्रवाहित हो रहा है धमनियों से रक्त सिंधु को |
भाल रंगों से सजाकर अश्रुबिंदु को छुपाकर
उठ खड़ा है शस्त्र थामे भय तरंगो को हटाकर
सघन है भय का बबंडर मृत्यु का है अब स्वयम्वर
आज होगा ज्ञात की ये शक्ति है या बस आडम्बर
कम्पित हुए हैं शस्त्र क्षत-विक्षत हैं अस्थि वस्त्र
अज्ञात सिद्धांतों पे हैं तिष्ठित अब कालचक्र
काल का कर्षण हो आकर्षण या प्रतिकर्षण,
विकेन्द्रित कर रहा है हृदय रूपी शक्ति बिंदु को |
तन हुआ है शीत सा मन गा रहा जय गीत सा
अनुमान है ये जीत का प्रस्थान है अब जीव का
विकलांग है भाषा स्वरों की पंक्ति खंडित है
मूर्छित चित्त सी लेटी कला ये रक्त रंजित है
श्वेत वस्त्रों मैं सुशोभित वायुरोधित अग्निशोधित
नभविखंडित धरा-रंजित नीर धारा मैं विसर्जित
मृत्यु का चित्रण है जय से युक्त भय से मुक्त,
समर्पित हो रहा है ब्रह्म रूपी केंद्र बिंदु को |
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