गुरुवार, 10 सितंबर 2015

क्या कहें- 2

क्या कहें- 2

एक रोज सपनो में आयीं थी तुम हाथ में एक पेंसिल लेकर
में पूछने ही वाला था कि तुमने उसकी नोक चुभोकर जगा दिया मुझको
रात भर बैठा सोचता रहा उस चांदनी रात के उजाले में
इतने दिनों बाद तो देखा था तुम्हे उन सफ़ेद कपड़ो के लिबाज़ में
जो तुम अक्सर पहनकर मंदिर जाया करती थीं
खैर सपना ही तो था फिर भी आँखों कि ऊपरी पर्त को नमी दे गया
फिर न जाने क्यों नजरें पेंसिल पर जाकर रुक गयी
में घंटो उसे टकटकी लगाकर देखता रहा
नटराज की थी या अप्सरा कि इतना तो नहीं पता
पर चुभन तो उसकी ही थी जिसने मुझे रात भर जगाये रखा
यकीनन तुम्हारे खयालो को ज़िंदा बनाये रखा
जाने भी दो क्या कहें अब
तुम्ही ही कुछ बोलो में तो बस अपनी ही कहता हूँ
तब भी कहता था जब तुम डांट देती थी या फिर मुस्कुरा कर
मेरे अरमानो को परवान देती थी
अब तो तुम भी नहीं फिर भी यहाँ कुछ बदलता ही नहीं
बारिश भी वैसी ही होती है पेड़ो पर पत्ते भी वैसे ही हिलते है
हाँ साँसों के आने जाने में कुछ फ़र्क़ जरूर है
अब वो रास्तो पर तेज नहीं दौड़ती उन हवाओं कि तरह
जो कभी तुम्हे देख कर ओलिंपिक की एथलीट बन जाती थी
गुजरती तो मेरे अंदर से ही थी न जाने क्यों रास्ता तुम्हारा तलाश करती थी
शायद मेरी जो नहीं थी
बस एक और चीज बदली बदली सी नजर आती है
पहले रात और दिन हुआ करते थे इस आशियाने में
अब सूरज अपना पर्दा गिरने ही नहीं देता
ओह हो ….फिर वही पेंसिल !!!!!
जरा सी ऊँगली में ही तो चुभायी थी
पर दर्द अब तक होता है “सच्ची” में सोने नही देता
न जाने क्या अजीब सा जादू है इस दर्द में
महसूस में करता हूँ और करवटे मेरी डायरी के पन्ने बदलते है
और क्या बयां करू तुम्हे
याद है तुम्हे, अक्सर मिल जाया करती थी तुम
कभी उस मोड़ पर जहाँ गुलाब की लकड़ी का घर है
पर कभी फूलों कि महक नहीं आयीं उस घर से शायद लकड़ी जो ठहरी
वो घर अब सिर्फ बारिश में भीगता चुपचाप सहमा सहमा सा रहता है
कभी उधर से गुजरता हूँ तो टप टप बूंदों कि आवाज़ सी आती है
जैसे कोई सिसकियाँ ले रहा हो
उसको छोड़े तो तुम्हे बहुत देर हो गयी
पर उसकी आँखे तो अभी तक गुलाब के रंग कि तरह ही नजर आती है
मन तो करता था उस सूरज को रोक लूँ जो तुम्हारे हर एक दिन को लेकर भागा जा रहा था
पर मेरे हाथ काँपने लगते थे ये सोचकर
कि कहीं तुम्हारी मंजिल कि तलाश अधूरी न रह जाए
हाँ!!!!! पर मुझे सबसे ज्यादा तुम एक जगह याद आती हो
जहाँ हर रोज तुम्हारे पैरो कि खनक से वो शाम गुलजार हुआ करती थी
वो एक दूर लम्बा सा रास्ता जहाँ अब तन्हाई की धूल ही उड़ती है
!!!!!फिलहाल कहने को तो बहुत से अहसास बाकी है
फिर कहेंगे एक दिन जब किसी रोज आयोगी सपनो में पेंसिल लेकर
अभी तो खिड़की के बाहर फिर वही रौशनी आयी है मिलने
तुमने भी अक्सर देखा होगा उसे
मैं बुलाता भी नहीं फिर भी हर रोज चली आती है
पंछी भी उस से कुछ प्यार से बोल रहे है
शायद गुड मॉर्निंग कह रहे हो !!!!!
वो उनसे मिलने आती है या मुझसे ये तो पता नहीं
लेकिन उसके आने से एक और है जो अपने घर वापस वापस चली जाती है
सब लोग तो उसे शांति कहते है पर जब तक मेरे साथ होती है
ख़ुशी के नाम से पुकारता हूँ उसे
वही है एक जो "सच्ची" में उस पेंसिल का दर्द दूर करती रहती है !!!!!

……………………………………शिशु ……………………………………………..

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