तू कहती रही वो तेरी दास्तां
सुननेवाला मगर कोई न था
तकलीफ तेरी भले थी बडी
समझ जाये ऐसा कोई न था
जो रुसवा हुई तेरी आबरू
किसीको फर्क पडणा न था
सडकपर अकेली तू मरती रही
किसीको तुझसे मतलब न था
तू करती रही मिन्नते बार बार
इंसानोमे वहा कोई इनसां न था
तू रोती रही भटकी यहासे वहा
पोछ्नेवाला आंसू कोईभी न था
उठा है जो परदा तेरे जिस्मसे
अब आवाज कोई उठायेगा क्या
बदनसीब तू है गरीबिमे पैदा हुई
तेरे जान की आखीर किमतही क्या
तेरे जानकी आखीर किमतही क्या
शशिकांत शांडीले (SD), नागपूर
भ्रमणध्वनी :- ९९७५९९५४५०

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