।।ग़ज़ल।।खुदी का दिल दुखाया हूँ ।।
मुझे है याद वो लम्हा अभी न भूल पाया हूँ।।
कभी आँखे ,कभी दिल को ,कभी खुद को रुलाया हूँ ।।
मुझे मालुम नही था कि छिपा है गम का वो मंजर ।।
तेरे चेहरे के दर्पण में तुझे न देख पाया हूँ ।।
तुम्हे तो याद ही होगा तेरी नजरो का अजमाना ।।
छुपा कर आह दिल की मैं हमेसा मुस्कुराया हूँ ।।
तनिक भाये थे दिल को तुम उठे ग़र्दिश के मौसम में ।।
मग़र मुझको पता क्या कि किनारो पर भुलाया हूँ ।।
न जाने आज क्यों मुझको बड़ी तकलीफ़ है होती ।।
भरोसा कर किसी पर मैं खुदी का दिल दुखाया हूँ ।।
यकीनन हमवफा तुमसे नही कोई शिकायत है ।।
खुदी के दिल का पागलपन नही मैं रोक पाया हूँ ।।
……..R.K.M
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