वक्त की दुश्वारियों को जैसे तैसे सह रहे हैं
लेकिन घर वाले हमारे हमको पागल कह रहे हैं.
दिल को दिलों से न मिलाते तिकड़मों को जान जाते
स्वार्थ सिद्धि में लगे हम जो केवल अपना घर बनाते
तब हमें शायद ये दुनियाँ इतनी इज्जत न बख्शती
हम मिलना चाहे ना चाहें फिर भी मिलने को तरसती
अपने पापों की सजा को पूरी तरह हम सह रहें हैं
लेकिन घर वाले हमारे हमको पागल कह रहे हैं.
जब दूसरों को देखकर तुम अपनी खुशियां तय करोगे
तुमको मिला है जो उसी पर नाज तुम कैसे करोगे
अपने सोने को भी फिर पीतल समझ कर छोड़ दोगे
नकली चमक से भूल कर आखों के दिए फोड़ लोगे
कबसे इन बातों को हम सबसे खुलकर कह रहे हैं
लेकिन घर वाले हमारे हमको पागल कह रहें हैं
मित्र वो जो दुःख में खड़ा हो कब से सुनते आ रहे हैं
हम तो इसी को मान कर सब काम करते जा रहे हैं
भाग्य में लेकिन हमारे कोई भी यश न लिखा है
संसार के बाजार में धन ही फकत सबको दिखा है
मर कर भी कितने दीन ही अब तक जिन्दा रह रहें हैं
लेकिन घर वाले हमारे हमको पागल कह रहें हैं.
वक्त की दुश्वारियों को जैसे तैसे सह रहे हैं
लेकिन घर वाले हमारे हमको पागल कह रहे हैं.
शिशिर “मधुकर”
Read Complete Poem/Kavya Here घर के पागल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें