शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

तन्हा इन्सान

आज हम इंसान नहीं मशीन हो रहे हैं
गम और खुशी बिन जिन्दगी में लीन हो रहे हैं
हमको जो ले आए हैं जीवन में इस मुकाम पर
वो कहते हैं हालात बेहतरीन हो रहे हैं।

हम भी इसी को मान कर चुपचाप चल रहे हैं
सोने के महल में बैठ खाली हाथ मल रहे हैं
गौर से देखोगे तो तुम को नजऱ आ जाएगा
जिन चेहरों पे कभी नूर था वो कैसे ढल रहे हैं।

एक जमाना था घर में समा जाता था खानदान
दो कमरों का हो चाहे वो हो एक बड़ा मकान
भाई बहनों में कभी था जो प्यार उसकी छोड़िए
अब तो हुए कमजोर बूढ़े माँ बाप खल रहे हैं।

खामख्वाह भी पहले हुआ करती थी खूब बात
सरदी की नरम धूप हो या गर्मियों की रात
फिर से उन्हीं लम्हों को पाने की लिए आस
तन्हा हुए दिलों में वो अरमान मचल रहे हैं।

झगड़े तो पहले भी हुआ करते थे घरों में
कड़वाहट मगर आती नहीं थी फिर भी सुरों में
वक्त नें बदले हैं लेकिन कुछ इस तरह हालात
रूठे हुए सबसे हमें अब साल तीन हो रहे हैं।

आज हम इंसान नहीं मशीन हो रहे हैं
गम और खुशी बिन जिन्दगी में लीन हो रहे हैं
हमको जो ले आए हैं जीवन में इस मुकाम पर
वो कहते हैं हालात बेहतरीन हो रहे हैं।

शिशिर “मधुकर”

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