आ गए हैं हम लो, अब तुमसे मिलने होली
हँस कर गले लगा लो, और कर लो तुम ठिठोली।
हाथों में लेके चन्दन, माथे मेरे लगा दो
प्रेम के रंगो से, तन मन मेरा भिगा दो
मस्ती के इस आलम में, धीरे से वो भी कह दो
बात दिल की चाह कर, अब तक ना तुम जो बोलीं।
आ गए हैं हम लो, अब तुमसे मिलने होली
हँस कर गले लगा लो, और कर लो तुम ठिठोली।
खुल कर गले मिलने का, मौका न फिर मिलेगा
मिलने मिलाने से ही, चाहत का गुल खिलेगा
कब से तड़प रहा हूँ, उम्मीद के सहारे
तुम अब तो पिघल जाओ,और भर दो मेरी झोली।
आ गए हैं हम लो, अब तुमसे मिलने होली
हँस कर गले लगा लो, और कर लो तुम ठिठोली।
मौसम ने ली है करवट, आमों पे बौर आया
अब अच्छी लग रही है,पेड़ों की घनी छाया
चारो तरफ है छाई एक भीनी सी मदहोशी
सपने तेरे संजो कर, आँखे न हमनें खोलीं।
आ गए हैं हम लो, अब तुमसे मिलने होली
हँस कर गले लगा लो, और कर लो तुम ठिठोली।
कान्हा के प्रेम में जब, डूबा था जहाँ सारा
आँखों में बस गया था,जब नन्द का दुलारा
बृजवासियों ने रंगो का, तब लिया सहारा
और रंगो में रंग गई, हर गोपी बृज की भोली।
आ गए हैं हम लो, अब तुमसे मिलने होली
हँस कर गले लगा लो, और कर लो तुम ठिठोली।
शिशिर “मधुकर”
Read Complete Poem/Kavya Here होली गीत
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें