- लिखी थी एक नज्म
जिसमे लिखना तेरा नाम रह गया !
किया जो भी काम,
सब में एक काम अधूरा रह गया !!इतिफाक से हुए मुखातिब,
टकराकर उनसे जख्म ताज़ा हो गया !
बाते हुई नजर के इशारो से
जुबान बंद थी, सलाम अधूरा रह गया !!रहेंगे जहाँ में रोशन तेरे नाम से
जाते जाते बस वो इतना कह गया
जब गुजरा था मेरे बगल से
एक बार नजर मिलाना अधूरा रह गया !!हमे शौक न था पीने का
जालिम नजरो से पिलाने को कह गया
कातिल अदा से किया वार
मोहब्बत का फ़साना अधूरा रह गया !!जमाने की बद्दुआ कहे “धर्म”
Read Complete Poem/Kavya Here लिखी थी एक नज्म ...
या किस्मत अपना कहर ढहा गया !
मिलन से पहले यार जुदा हुआ
एक शायर का कलाम अधूरा रह गया !!
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( डी. के. निवातियाँ )

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