मंगलवार, 1 सितंबर 2015

बिखर गया

बिखर गया
अगर सपना सुहाना
जिदंगी के लिए
फिर से सपने सजाना
और कर्म मे जो अकेला जुट गया
चाहे ना किस्मत हो साथ
ना मिले कोई सहारा
दुर्गम से दुर्गम गंतव्य से सहज ही निकल गया
बिखर गया
अगर परिवार तेरा
स्वजनो के हृदय से
उठ गया हो तेरा डेरा
छोड दे मोह माया अगर मन बँध गया
कर हृदय विस्तृत
सब जनो से हाथ मिला
प्रेमभाव से सम्पूर्ण धरा को अपना परिवार बना
बिखर गया
अगर सम्मान तेरा
सम्मानकी खातिर
दिखा फिर से सवेरा
छोड के अपमान की चिंता जो आगे बढ गया
निकल गया निर्भीक चिता से
और मिला उसको अमृत
सफल वही इन्सान बना

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