शनिवार, 9 मई 2015

अंजान मुसाफिर

मै भटका हुआ एक अंजान मुसाफिर,
बिना सोचे कुछ चले जा रहा हूँ.
बीच मंझधार मे फंसी मेरी नैया,
पवन के दिशा पे लिये जा रहा हूँ.

मंजिल तब मिलेगी जब पता हो इसका कुछ,
बिना मंजिल के ही चले जा राहा हूँ.
जिन्दगी तो बीत चुकी ही आधी आधी हैं बाकी,
बिन फलसफा ही जिये जा रहा हूँ.

एक अर्थ और दिशा दे जो मेरे जीवन को,
तलाश उस मुक़द्‍दस इंसान की किए जा रहा हूँ.
क्या हैं जीवन और क्या हैं इसका मकसद,
मनन इसी सार का निरन्तर किए जा रहा हूँ.

-रचनाकार: नन्द किशोर

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