सोमवार, 4 मई 2015

गुजरे लम्हे

गुजरे लम्हों को फिर से, काश ! ढूँढकर ला पाती
कर लेती कैद निगाहों में,गर एक झलक भी मिल पाती
माटी की सोंधी खुशबु जब, आंगन को महकाती थी
कच्ची अमिया, खट्टी इमली भर झोली मै लाती थी
एक जरा सी झिडकी पर हम, भर भर आंसू रोते थे
अम्मा जब देती थी इकन्नी, तब जाकर चुप होते थे
अब वो आंगन नहीं रहा ना अमिया के वो बाग रहे
अम्मा भी जाने कहाँ गयी, हम किससे अपनी बात कहें

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