सवेरा और शाम पुछे ,
कब होगी ख़त्म विनाश !
बदल भी गरजकर बोले,
इंसानो पे नहीं विश्वास ! !
स्वर्ग सी धरती को ,
तुम्ही ने बनाया नरक !
प्रकृति की प्रलय से ,
कुछ न सीखे अब तलक !!
टुटा आसमा ,धरती सहमी ,
फिर आया प्रकृति आपदा !
अब नहीं तो कब करेंगे ,
हम मानवता की परवा ! !
आधुनिकता ला रही है ,
विनाश की लहर संग !
धीरे-धीरे बदल रही है ,
हरियाली का भी रंग ! !
अरे जग के इंसानो ,
मिट जाएगी वाजुद हमारी !
प्रकृति में हम है ,
प्रकृति से है हम ! !

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