मंगलवार, 5 मई 2015

धरती हिली

एक शहर हिला,
पूरी ज़िन्दगी
हिल गई,
कुछ उस हलचल में,
छोड़ कर चले गए,
रह गए कुछ ,
रोने के लिए,
सपना देखा
पूरी ज़िन्दगी का,
पर क्या पता था,
ये क्षण आखरी होगा,
रोते बच्चे, रोती माँ,
बेसहारा से लगते है,
देख कर अपने सहारों को,
कुछ ना बोलते हुए,
एक और सहारा खोजने,
लगते है |
आँखों में आंसू भर आते है,
उन बेबस चेहरों को देख कर,
ज़िन्दगी का ये सच,
बहुत भयानक है,
रुला गया इस धरती को,
निगल गया कई खुशियों को |

बी.शिवानी

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