सोमवार, 14 दिसंबर 2015

मै गजल सुनाऊँ क्या

यूं उसे मनाऊँ क्या,
ख़ुद भी रूठ जाऊँ क्या।

वो मेरा अजीज़ है,
उसको आज़माऊँ क्या।

अश्क़ बेशक़ीमती,
मुफ़्त में लुटाऊँ क्या।

हँस रहे हैं दिल के ज़ख़्म,
मैं भी मुस्कुराऊँ क्या।

ख़ुद-ब-ख़ुद है जो अयाँ
ज़ख़्म वो छुपाऊँ क्या।

आँधियों से जा भिड़ूँ,
और टूट जाऊँ क्या।

आप क्यो उदास हैं,
मैं ग़ज़ल सुनाऊँ क्या।
‘ सौरभ’…..

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