बुधवार, 2 दिसंबर 2015

व्यथा -यौन-शोषण से प्रभावितों को समर्पित

ये है,
नहीँ, ये नहीँ है,
वो है,
नहीँ, वो भी नहीँ है,
इनमेँ से कोई भी नहीँ है,
ये तो इन्सान हैँ,
वो तो कोई ओर था,
इन्सानोँ के भेस मेँ,
कोई आदमखोर था,
जिसने मेरी अस्मत को,
तार-तार किया,
इन्सानियत का हैवानियत ने,
चीर-फाड़ किया,
शायद उसके घर मेँ,
बेटी नहीँ होगी,
बीवी नहीँ होगी,
बहन नहीँ होगी,
पर, माँ तो ज़रूर होगी,
क्योँकि ऐसे ही कोई,
दुनियां मेँ नहीँ आ जाता,
फिर क्या,
नारी जात उसे,
हवस का शिकार दिखती है,
और ऐसा करते उसे कभी,
अपनी माँ, बेटी, बहन, बीवी का,
ख़्याल नहीँ आता है,
कि उनके साथ अगर ऐसा होता,
तो परिस्थिति क्या होती,
हर नारी भी तो किसी की,
बेटी, माँ, बहन, बीवी, बहू होती है
शायद वो सचमुच इन्सान नहीँ है,
अगर होता तो ये बात समझता,
हाँ, वो हैवान है,
इन्सानी खाल मेँ,
एक ख़ूंख़्वार, आदमखोर,
हवस पीड़ित हैवान!!
(C)परवेजं’ईश्की’

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