बुधवार, 9 दिसंबर 2015

जरुरी तो नही ...

जरुरी तो नही …

मेरी कलम अक्सर बाते करती
मुझसे ये कहती, लिखू वही जो तू चाहे,
सर्वदा सत्य असत्य का भेद जाने
इतना गहरा बंधन सदैव जरुरी तो नही !!

ज्यादा उम्मीद मत रखना मुझसे
अक्सर मेरा दिमाग कहता मुझसे
मुझे भी तो कभी आजादी चाहिए
मै हर रोज़ सोचूँ तेरे लिए जरुरी तो नही !!

सहसा मेरे हाथ स्थिर हो गए
मै अवाक था संकोच वश पुछा
अब तुम्हे क्या हुआ भाई, जबाब था,
हर वक़्त चलू इशारे पर जरुरी तो नही !!

जबाब सुनकर लब सिल गये
कोई शब्द न फूटा, जाने क्या हुआ
शंका भाप कारण पुछा,अधर हिले
स्पंदित हो स्वर निकला बोलना जरुरी तो नही !!

प्रतिवचन सत्य से लबालब था
नयन सुर मिलाते हुये टिमटिमाये
आक्रोश में पलके झपकाकर कह गए
हर शै तेरे नजरिये से देंखू जरुरी तो नही !!

इतने से मैं अभी संभला भी न था
दिल से आह ! की आवाज निकली
कराती शाश्वत आत्मज्ञान का आभास
कभी तो मुझे मेरे हाल पर दे छोड़
तेरे इरादो को साकर करू जरुरी तो नही !!
!
!
!
0——–:::—डी. के. निवातियाँ –::——-0

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