मुद्दत गुज़री तुम न मिले हो
इतनी दूर भी क्यों रहते हो।।
बैठ के साहिल पे फिर तुम क्यों
यादों मेँ मेरी गुम रहते हो।।
चाँद ने पूछा सूनी पलकों से
रात मेँ क्या गिनते रहते हो।।
ख्वाबों मेँ आकर अक्सर तुम क्यों
जो न कहा वो पढ़ लेते हो।।
और तो सबकुछ ठीक है लेकिन
मेरी तरह तुम भी कहते हो।।
(C)परवेज़ ‘ईश्क़ी’
Read Complete Poem/Kavya Here मेरी तरह तुम भी कहते हो!!
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