पिता के आँगन से सफर मेरा
सजा संवरा दुल्हन का रूप मेरा
विद्या का भंडार, सुंदरता की मूरत ऐसा रंग रूप मेरा
साजन के आँगन जाने को तैयार सपना मेरा
पहली सीढ़ी, ससुराल की दहेज़ मांगता ससुर मेरा
दिया ससुर को दहेज़ बढ़ा कदम अब मेरा
दूसरे कदम, सास खड़ी माँगती ए टी एम का नंबर मेरा
दिया नंबर सोंच दूल्हा आगे मिलेगा मेरा
तीसरा कदम, देवर खड़ा मांगता वो जेवर मेरा
उतारे सारे जेवर सोंच दूल्हा आगे मिलेगा मेरा
अब देख ननद का खेल, चिंदी ना छोडा मेरा
उतरवा लिया वस्त्र पूरा का पूरा
अब मैं बनी भिखारन जैसी, ढूंढती दूल्हा मेरा
अंत में आई दूल्हे की बारी, देख उसने कहा
“भिखारन” मैं नहीं दूल्हा तेरा
टुटा सपना मेरा, रह गया जीवन कुंवारा मेरा
ना दूल्हा बेवफा ना दुल्हन बेवफा
फिर क्यों पिता पर बोझ ये जीवन मेरा
– काजल / अर्चना
सोमवार, 7 दिसंबर 2015
दूल्हा आगे मिलेगा
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