मै रहू धीर गंभीर उन्हें कतई नही भाता करू गर दिल्लगी वो भी रास नही आता ! किस तरह पेश आये जनाबे खिदमत में अपना दिल -ऐ- नादाँ समझ नही पाता !! ! ! !
::—– डी. के. निवातियाँ ——::
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