गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

ख्वाहिशें

ख्वाहिश है , कि हर बच्चा हँसता खिलखिलाता रहे ,
कि उसकी हँसी, मतलबहीन प्रतियोगिताएँ न छीन लें।

ख्वाहिश है, कि छोटा होता बचपन इतना न हो जाए छोटा ,
कि कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया,उससे उसका पूरा का पूरा बचपन न छीन लें। ,

ख्वाहिश है कि हर फूल खिलता ,महकता रहे ,
कि शहर का प्रदुषण,उससे उसके रंग चमक और खुश्ब न छीन ले।

ख्वाहिश है कि शहर के कंक्रीट जंगल में, कुछ हिस्सा मिट्टी का बच जाए ,
कि हमारा यह शहर हमसे, मिटटी की सोंधी ख़ुश्बू ना छीन लें।

ख्वाहिश है कि हर रिश्ता, सिर्फ फेसबुक तक न हो जाए सीमित।
कि समय का अभाव हमसे, हर रिश्ता न छीन ले।

ख्वाहिश है कि युवां, जिंदगी की अंधी दौड़ में इतना न हो जाए मशगूल,
कि काम बोझ उससे, जीवन की सारी की सारी खुशियां न छीन ले।

यूँ तो मेरी ऐसी छोटी मोटी ख्वाहिशें हैं बहुत ,
मगर डरती हूँ कि आने वाला कल मेरी सारी की सारी c न छीन ले। ख्वाहिश है , हर बच्चा हँसता खिलखिलाता रहे ,
कि उसकी हँसी मतलबहीन प्रतियोगिताएँ न छीन लें।

ख्वाहिश है कि छोटा होता बचपन इतना न हो जाए छोटा ,
कि कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया उसका पूरा का पूरा बचपन नछीन लें। ,

ख्वाहिश है कि हर फूल खिलता ,महकता रहे ,
कि शहर का प्रदुषण उससे उसकी चमक और खुश्बू न छीन ले।

ख्वाहिश है कि शहर के कंक्रीट जंगल में, कुछ हिस्सा मिट्टी का बच जाए ,
कि हमारा यह शहर हमसे, मिटटी की सोंधी ख़ुश्बू ना छीन लें।

ख्वाहिश है कि हर रिश्ता, फेसबुक तक न हो जाए सीमित।
कि समय का अभाव हमसे, हर रिश्ता न छीन ले।

ख्वाहिश है कि युवां, जिंदगी की अंधी दौड़ में इतना न हो जाए मशगूल,
कि काम बोझ उससे, जीवन की सारी की सारी मस्ती न छीन ले।

यूँ तो मेरी ऐसी छोटी मोटी ख्वाहिशें हैं बहुत ,
मगर डरती हूँ कि आने वाला कल मेरी सारी की सारी ख्वाहिशें न छीन ले।

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here ख्वाहिशें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें