बुधवार, 2 दिसंबर 2015

किसी ओर की माँ

किसी ओर की माँ

जब माँ की याद सताती है
उसकी हर बात याद आती है
हर कोई माँ को याद कर रोता है
लेकिन यह कभी नहीं सोचता है
तूने कभी उसको खाना खिलाया था
तूने कभी हाथों से उसको दूध पिलाया था
तूने कभी दवाई पिलाई थी
क्या कभी उसके लिए नई साड़ी खरीदी थी
या केवल कफ़न ही खरीद कर लाया है
क्या उसके जन्म दिवस पर केक काटा था
क्या कभी उसे घुमाने ले गया था
उसका टूटा चश्मा कब बनवाया था
उसकी फोटो पर फूल चढ़ाता है
उसके नाम पर ग़रीबों को खाना खिलाता है
जैसा तेरा इन्तजा़र करती थी
क्या तूने वैसा इन्तज़ार किया
अब बरसों बाद विदेश से लौटा है
वृद्धाश्रमों में अब माँ को ढूँढता है
क्या चीथड़ों में उसे पहचान पाएगा
तू उसको ऐसे देखकर शरमा नहीं जाएगा
पहचानने से इन्कार भी कर देगा
दूरकी कोई रिश्तेदार बतायगा
अगर वह गले लगाना चाहेगी
तेरी आँख नीचे झुक जाएगी
क्यों सब दिखावा करता है
क्यों उसके लिए अब रोता है
अब आँसू बहाने से कोई मतलब नहीं
अब वह नहीं है तेरी माँ
अब वह है किसी ओर की माँ

संतोष गुलाटी

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