शनिवार, 5 दिसंबर 2015

दुरी

कभी आवाज़ सुनने को तरसते है
तो कभी उन्हें देखने को तरसते है
ये सोंच के परेशान है इस वक़्त वो क्या करते है
वो खिलते है या हसते है
ये सोंच कर दिल को तसल्ली देते है
लगता है एक लम्हा ही वो साथ देते है
उसी के सहारे जीवन हम बिता देते है
खुश होते है सूरज की पहली किरण जब देखते है
इस किरण ने उन्हें भी छुआ होगा ये सोंचते है
बस सारा दिन कड़ी धुप में खड़े हो जाते है
– काजल / अर्चना

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