कुदरत कि ये कैसी इंतहा है
दुनिया धीरे धीरे मिट रही है
बेकसूर चेहरो कि बेबसी कैसी
मेरा गुनाह धरती भुगत रही है
बडो कि थी शुरुवात यकिनन
मै खुनी हात रंगाता चला गया
आखिर मेरी किस्मत का लिख्खा
अंजाने दुनिया मिटाते चला गया
डूबने लगा मेरे खुशियो का घर
क्या छोटे बडे क्या नर नारी है
अफसोस तो होता है अब मगर
मैने हि कुदरत को सताया है
देख नजारा नम होती है आंखे
पाणी पाणीसी जिंदगी हो रही है
क्या सोच कि थी बरबादी मैने
मेरीही कश्ती सागर मे खो रही है
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शशिकांत शांडीले (SD), नागपूर
भ्रमणध्वनी – ९९७५९९५४५०
दि. ०४/१२/२०१५

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