गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

तू वजह हैं जीने का ! [ग़ज़ल]

मुझे हैं जुस्तजू,तेरी इब्तिसाम देखने का !
ज़िंदगी से तेरी हर ग़म चुरा लेने का !!

अब तेरी गलियों में आना-जाना हैं बेवजह,
तू चांद हैं,जी करता हैं दिदार करने का!

जितना देना हैं दे, मेरे ज़िंदगी को सजा,
जुरत करूँगा हर दफ़ा,तुमसे ईश्क करने का!

बन जा तू हमराही,दिल के करीब आजा,
मैनें देखा हैं ख्वाब,तेरे साथ चलने का !

होगी ज़िंदगी हर दिन रंगीन तुमसे मिलके,
कैसे कहूँ जज्बात,तू वजह हैं जीने का !

*Dushyant kumar patel*

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