हमारा बचपन।
बचपन जमाना होता था ,
खुशियों का खजाना होता था ,
थक हार कर आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना होता था ,
नए पुराने दोस्त थे
हर रिश्ता निभाना होता था ,
खबर न रहती सुबह की
न शाम का ठिकाना होता था
कार्टून के दिन होते थे ,
हसना और हँसना होता था ,
छोटी छोटी बातो पर झगड़ना
छोटी छोटी बातो पर रो जाना होता था ,
फूलो की महक होती थी ,
दिल तितलियों का दीवाना होता था ,
बारिश में कागज की कश्ती हर मौसम सुहाना होता था ,
हर मौसम सुहाना होता था।
दादी की कहानी होती थी ,
हर किस्सा पुराना होता था ,
पापा की मार गलती पर
फिर माँ का मनाना होता था।
न जाती का पता न धर्म का
हर दोस्ती को अपनाना होता था।
बेतुकी की बाते करते थे ,
रात में सबको डराना होता था ,
आज जेब में हज़ार के नोट है
मगर वो ख़ुशी नही जो पहले पाँच रूपये में थी ।
आज भी यार दोस्त कितने है ,
मगर वो ख़ुशी नही जो पहले की यारी में थी।
आज भी बारिश होती है।
मगर कागज की कश्ती तो डूब गयी
आँखे भर आई आज मेरी की ,
वो भी क्या दिन थे ,
जैसे बचपन का जमाना होता था।
अलोक उपाध्याय

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