गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

यहाँ से दूर...!!

यहाँ से दूर
बहुत ही दूर
खुले मैदानों में
जहाँ कलियाँ मुस्कुराती है
पंछी गीत गातें हैं
हवा सरसराती है
धूप गुनगुनाती है
फिज़ा महकती जाती है
जहाँ आज़ादी की
फसलें काटी जाती है
जहाँ ज़िंदगी उम्र से नहीं
जीने के पलों से गिनी जाती है
जहाँ रोकने – टोकने वाला
समाज नहीं होता
और जहाँ इस दुनियां के
कोई भी क़ायदे कानून की
ज़रूरत ही नहीं पड़ती
जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़
मुहब्बत बसती है
हाँ , वहीं पे
साँसों के थमने से पहले
मैं तुम्हें इक रोज़ मिलूँगा…!!

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