गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

रेलमगरा

मेरे सपनो का रेलमगरा

बहुत सुनाई मेने पहलिया अब तो गीत सुनाता हु
दो टुकडो से बना जिसकी गाथा गाता हु
जिसमे में ना लोहा पथ गामीनी ,ना मामा का मगरा
दो विधान सभा से घिरा मेरा रेलमगरा है
विधान सभा में भी 14,15 का बटवारा, घोर से देखा एका एक अधुरा है
यहां सभ्‍यता और इतिहास का फेला डेरा है
सभ्‍यता में गिलुण्‍ड बसा, इतिहास में मां जलदेवी का बसेरा है
यहा तो महाराणा प्रताप की गाथाओ का झमेला है
यहां जमदुत से आया मन्‍दिर भी बहुत पुराना है
जिसमें बिराजे चारभुजा जी सादडी में लगा डेरा है
यहा बनास भी रहती निरास फिर भी गंगा की माया है
नन्‍द समन्‍द से निकला पानी मात़कुण्डिया आया है
यहा के देवो में पछमता ,ममता माया सुरज बारी है
आस्‍था कि बहती गंगा, पीडा को हराया है
यहा हर्षिता लाने वाला 26 जनवरी का मेला है
पशुओं का सुशोभित करने वाला धनेरिया ताकाराज मेला है
यहा धरती माता की भी बडी मेहरबानी है
हैजा में सोना उपजें ,चान्‍दी जस्‍ता की खाने है
यहा एशिया का प्रथम स्‍मेटर भी मेहन्‍दुरिया का दिवाना है
वहां प्रवासियों का आना जाना लगा रहता है
यहां गणपति उत्‍सव भी हर्षता से मनाया जाता है
नवरात्री की डांडिया माता चावण्‍डा के दर हो जाती है
यहा निर्मल भारत भी बामनिया कला कहलाया है स्‍वच्‍छता की चादर ओड कर भी लुभाया है

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here रेलमगरा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें