गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

धुंधुली यादें

धुंधुली यादें

चल बैठ कहीं खोलें पिटारा
टुकड़े धुंधली शाम के
मुठी में बंद सितारा
बचपन में लिपटे झिलमिल कण
धूमिल पड़ा नज़ारा
चल बैठ कहीं खोलें पिटारा
तेरी आँखों में आँसू
मेरी भी तो नम थी
गीली चुन्नी के वे टुकड़े
हमराज़ थी हमारा
चल बैठ कहीं खोलें पिटारा
बदली राहें छूटी आहें
कसमों का वो निवाला
अश्रुधार से धुला हुआ मन
बन गया शिवाला
चल बैठ कहीं खोलें पिटारा

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