गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

इकरार नजर आता है...... (ग़ज़ल)

लहर बन कर तुझमे उमड़ जाने को जी चाहता है !
हमे तेरी नजरो में प्यार का सागर नजर आता है !!

बारिश की बूँद बनकर बरस जाने को जी चाहता है !
हमे तेरी जुल्फों में घुमड़ता बादल नजर आता है !!

तेरी बाँहो में टूटकर बिखर जाने को जे चाहता है !
हमे तेरी आगोश में मखमली सेज नजर आता है !!

कैसे रोके हम अपने दिल के मचलते जज्बातों को
तेरी बहकी अदाओ में प्यार का खुमार नजर आता है !!

न गिराया करो अश्क अपनी मृगनयनी आँखों से
हमे इनमे मोतीयो का लश्कर बहता नजर आता है !!

क्या खूब लहजा बख्शा है कुदरत ने जनाब को
लबो के हिलने से फूलो का झड़ना नजर आता है !!

यूँ न मुस्कुराया करो चेहरा छुपाकर “धर्म” से
हमे तेरी झुकी नजरो में इकरार नजर आता है !!
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—::०:: डी. के. निवातियाँ ::०::—

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