
आहे ! तेरी नज़र जब मेरी अंतिम यात्रा पर पड़ी
सभी जल के कहने लगे मेरे नसीब में जन्नत लिखी पड़ी
अजनबी की अर्थी को भी लोग कांधा दे
तू कम से कम हमे कांधा तो दे चाहे आंसू ना दे
शायद तेरे कांधे से चल, फिर से हम जी ले
और तेरी बेरुखी दुबारा ना मार दे
तू इस तरह मेरी चिता की लौ को ना देख
कही तेरे पसीने की बूँद को आंसू ना समझ बैठु
तेरे बीन बुलाए ही वापस धरती पर आने की हठ ना कर बैठु
– काजल /अर्चना

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