शनिवार, 12 दिसंबर 2015

चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं ---------------------------------------------- चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं। भविष्य को ढकी जाति, धर्म, द्वेष के पर्दों को हटाते हैं। प्रेम का नीर बहता अमृत बन,कोटि प्राण बसाते हैं; गंगा और सिंधु हैं दो बाहु जिसके जोर पर हम इतराते हैं। अखंड भारत माता के शृंगार को लगी दुश्मनों नजर; लूट लिया हमारी माँ को, बेटों को पराया बताते हैं। इन्सान को जीना सिखाता धर्म आज सिर्फ हमें लडाते हैं ; जिस भारती ने पाले पुत्र हजार, उस माँ को ही सौतेली बताते हैं। बिछड़े दोनों भाई अब तक, द्वेष ने इस कदर घुसपैठ किया मन में; स्वार्थ की मैली चादर तले चंद बहुरूपिए बरगलाते हैं! माना गलत संगति ने हमें भटका दिया राह से कभी, करोड़ों माँ के लाल कैसे सच्चाई से नजर चुराते हैं! मिल कर दोनों जिस्म, जमीन आसमाँ एक कर जाते! टुकड़े हुए दिलों पर आज हम बस मोमबत्तियां जलाते हैं। बड़प्पन है एक दूसरे के लिए इज्जत से शीश झुकाने में; आओ दीवारों को तोड़ कर फिर एक नया घर बनाते हैं।। चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं

चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं
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चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं।
भविष्य को ढकी जाति, धर्म, द्वेष के पर्दों को हटाते हैं।

प्रेम का नीर बहता अमृत बन,कोटि प्राण बसाते हैं;
गंगा और सिंधु हैं दो बाहु जिसके जोर पर हम इतराते हैं।

अखंड भारत माता के शृंगार को लगी दुश्मनों नजर;
लूट लिया हमारी माँ को, बेटों को पराया बताते हैं।

इन्सान को जीना सिखाता धर्म आज सिर्फ हमें लडाते हैं ;
जिस भारती ने पाले पुत्र हजार, उस माँ को ही सौतेली बताते हैं।

बिछड़े दोनों भाई अब तक, द्वेष ने इस कदर घुसपैठ किया मन में;
स्वार्थ की मैली चादर तले चंद बहुरूपिए बरगलाते हैं!

माना गलत संगति ने हमें भटका दिया राह से कभी,
करोड़ों माँ के लाल कैसे सच्चाई से नजर चुराते हैं!

मिल कर दोनों जिस्म, जमीन आसमाँ एक कर जाते!
टुकड़े हुए दिलों पर आज हम बस मोमबत्तियां जलाते हैं।

बड़प्पन है एक दूसरे के लिए इज्जत से शीश झुकाने में;
आओ दीवारों को तोड़ कर फिर एक नया घर बनाते हैं।।

चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं।।

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Read Complete Poem/Kavya Here चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं ---------------------------------------------- चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं। भविष्य को ढकी जाति, धर्म, द्वेष के पर्दों को हटाते हैं। प्रेम का नीर बहता अमृत बन,कोटि प्राण बसाते हैं; गंगा और सिंधु हैं दो बाहु जिसके जोर पर हम इतराते हैं। अखंड भारत माता के शृंगार को लगी दुश्मनों नजर; लूट लिया हमारी माँ को, बेटों को पराया बताते हैं। इन्सान को जीना सिखाता धर्म आज सिर्फ हमें लडाते हैं ; जिस भारती ने पाले पुत्र हजार, उस माँ को ही सौतेली बताते हैं। बिछड़े दोनों भाई अब तक, द्वेष ने इस कदर घुसपैठ किया मन में; स्वार्थ की मैली चादर तले चंद बहुरूपिए बरगलाते हैं! माना गलत संगति ने हमें भटका दिया राह से कभी, करोड़ों माँ के लाल कैसे सच्चाई से नजर चुराते हैं! मिल कर दोनों जिस्म, जमीन आसमाँ एक कर जाते! टुकड़े हुए दिलों पर आज हम बस मोमबत्तियां जलाते हैं। बड़प्पन है एक दूसरे के लिए इज्जत से शीश झुकाने में; आओ दीवारों को तोड़ कर फिर एक नया घर बनाते हैं।। चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं

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