शनिवार, 12 दिसंबर 2015

काश एक पंछि होते
उड़ते गगन को चुमने जाते
आसमा की अन्तिम छोर तक
दुनिया की अन्तिम मोर तक
हम भी तो सैर को जाते
काश एक पंछि होते…
लाल-लाल तारक अनार के दाने
चुगने को हम भी जाते
नदी-झरने की तरह हम भी लहराते
नदी-झरने से मीठी मोती लाकर
हम भी अपना प्यास बुझाते
बड़े ही मौज से दाने चुगते
काश एक पंछि होते…
उँचे-उँचे पेड़ पर,ठंडी-ठंडी छाव में
बड़े ही मौज से घर बनाते
आँधी हो या तुफान हो
मौसम होते जितने भी बुरे
सबो से हम भी लड़ जाते
काश एक पंछि होते…
उँचे नभ की सीमा तक जाकर
धरती की हरयाली देखकर
मन ही मन मुस्काते
बड़ा ही शुकून मिलता दिल को
जब लोगों की खुशियाली देख आते
काश एक पंछि होते…
रात होती घर लौट आते
नभ की सैर की बाते
चह-चहकर सबको सुनाते
फिर सपनो की दुनिया में हम खो जाते
काश एक पंछि होते…
सुबह-सबह नई किरनो के साथ
चह-चहकर मीठी गीत सुनाते
कभी शांति का दूत बन जाते
कभी एक-दुसरे का संदेश पहुँचाते
हर रोज वही बात दोहराते
उड़ते नभ को चुमने जाते
काश एक पंछि होते….!!!
@md.juber husain

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