बुधवार, 13 जनवरी 2016

a poem by ALOK UPADHYAY

पल में बदलें इतने रंग
देख के उनको सब हैं दंग
पूर्ण स्वयं को कहते हैं
अंग हुए हैं जिनके भंग
धूप की शै पर बढ़ते हैं
साये हैं जो मेरे संग
मुँह में उँगली वक़्त रखे
देखके मुझसे मेरी जंग
इस-उसकी क्यों बात करें
सबके अपने-अपने ढंग
‘उपाध्याय’ ही जीतेगा जंग,
तूफ़ाँ करले कितना तंग….!
by
ALOK UPADHYAY
photomania-9b83a39ae6f398874b4be6407756d584

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here a poem by ALOK UPADHYAY

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें