बात न पूछो पत्रकारिता की
हाल इसका अब मंडी जैसा बन गया है !!
जार जार किया मर्यादाओं को
पैसो के लालच में अब वी बिक गया है!!
नहीं सरोकार अपने काम से
बड़े बड़े गदारो का अड्डा बन गया है !!
इस तरह हुई मिलावट खून में
निर्लज्ज दलालो का व्यापार बन गया है !!
ताकत मानते थे जिसको हम
जनता का अब वो हथियार बिक गया है !!
किस पर करे हम आज भरोसा
लोकतन्त्र का चौथा स्तंभ हिल गया है !!
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!!___डी. के. निवातियाँ ____!!

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