शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

मुक्तक-संवर जाओगे- शकुंतला तरार

”संवर जाओगे”
हमारी ज़ुल्फ़ के साये में संवर जाओगे ,
हमारी आँख के काजल में ठहर जाओगे ,
जो फूल बनके घर-घर में महकना चाहो ,
हमारे प्यार की खुशबू से निखर जाओगे ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

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