सांझ ढले –
सूर्य जब खो जाता है अस्ताचल की ओर,
ना जाने क्यूं –
पूर्व दिशा में निरन्तर उठती मेरी आंखे,
सूर्य को ढूंढती हैं ।
तभी पत्तों के झुरमुट से आती आवाज़ –
खींच लेती है,
उत्सुक हो मैं –
पत्तों के झुरमुट में बन्धे अन्धेरे की
काली परतों में ढूंढने लगता हूं –
सूर्य रश्मियों को,
जो उस झुरमुट से छन-छन कर आती
मेरे मन आंगन के अन्धेरे में
सुबह की लालिमा भर जाती हैं ।
—– बिमल
( बिमला ढिल्लन )

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