बुधवार, 13 जनवरी 2016

बुढ़ापे की लाठी

बुढ़ापे की लाठी बने न कोई ,
जो माँ बच्चो के बिना ना सोई ,
निदियाँ खोई, दुनियाँ खोई, खो दिया रे चैना,
आँसुओ से उस माता के भीग रहे थे नैना,
बिस्तर पर पड़ी अस्वस्थ सी महसूस करती,
एकपल खड़ी हो बूढ़ापे की लाठी ढुढा करती,
आंखो मे आँसू, मन मे है संकोच,
दूर से ही निहारू, मन मै कुछ सोच,
हाथ पाँव अब फूले जाते,
वैशाखी अब वो टेक,
आंखो की रोशनी कम,जगह जगह थी ठेक ,
समय नजदीक आया
पर बेटा फिर भी न आया,
भाग्य को कोसे, कभी कोसे खुद को,
आंखो की टकटकी लगा कर देखे अपने लाल को,
प्राण अब छूटने के नजदीक थे,
अस्वस्थ शरीर के सारे वीर थे,
फिर भी ना आया वो बेटा,
प्राणो ने छोड़ा साथ,
ब्रह्म्लोक मै हो गयी अंतेर्धायन,
फिर आया वो बेटा,
पूछा वकील से कितना छोड़ गयी रे पैसा,
उंगली पकड़ चला था कभी माँ,
आज वैशाखी तोड़ माँ की,
अब पूछता है कितना छोड़ गयी रे पैसा,
पैसो को प्यारा बना, प्यारी माँ को भुला,
कभी झूलाया बचपन मै,भूल गया वो अंगना,वो झूला,
आज जरूरत थी माँ को, वो सेवाभाब पल मै भुला,
कलयुग के ये पापी, माँ बाप को क्या जाने,
दौलत के ये पुजारी,यश,वैभव,दौलत ही पहचाने,
माँ का आँचल कहा याद आता है,
बीबी के पल्लू मे, सारा प्यार दुबक जाता है,
कलयुग के बेटो की कबतक बात करू,
बस बहुत हुआ अब मै चलू,

Dr. Girish Mangal (written by me)

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