सोमवार, 11 जनवरी 2016

मेरी जिन्दगी, मेरी नहीं, तेरी जिन्दगी का हिस्सा तो है

मेरी जिन्दगी, मेरी नहीं,
तेरी जिन्दगी का हिस्सा तो है

मेरी जिन्दगी, मेरी नहीं, तेरी जिन्दगी का हिस्सा तो है
तेरी नमपलकों में दुबका अश्क का इक कतरा तो है।

माना कि हजार जुगनुओं से उजाला नहीं होता
पर हर याद की कतरन में छिपा कुछ उजाला तो है।

पतझर की कहानियाँ पढ़ते पढ़ते सोचता हूँ
हर किस्से में दिल मेरा खड़ाखड़ाता तो है।

वह कहता नहीं, गूंगा भी नहीं है दिल मगर
आँखों से ही बहुत बातें बेचारा करता तो है।

इस राह पर बिछे काँटे अंगारे न हटावो
इन्हीं की बदौलत दिल इसे पहचानता तो है।
—- भूपेन्द्र कुमार दवे

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