फूल बरसे, शबनम या मोती
सब एक सा लगता है
फूल बरसे, शबनम या मोती सब एक-सा लगता है
इस दिल पे जो भी बरसता है पत्थर-सा लगता है।
गम सावन है न भादों है, मौसम है न आबोहवा
जब भी बरसे है तो बेमौसम बारिश-सा लगता है।
इक गम की कतरनें हों तो जोड़कर समझ लेते
यहाँ कई गम की कतरनों का अंबार-सा लगता है।
गम के साये में फुदक-फुदककर चलके आये हैं
अब यूँ जीना भी बच्चों के खेल-सा लगता है।
गम तो खरीदा, न ही कभी बेचा जा सकता है
पर इनका सजाया जाना बाजार-सा लगता है।
—- भूपेन्द्र कुमार दवे

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