सोचो क्या होता
यदि न उगता सूरज
नित्य भोर में,
लालिमा पर भी
निशा का पहरा होता !!
सोचो क्या होता
अन्धकार अगर नही छटता
जीवन लगता शून्य प्राय
प्रातकाल की आशा होती
अगर निंद्रा का न अंत होता !!
सोचो क्या होता
देवदूत गर न करते क्रंदन
दीखता न पुष्पों में स्पंदन
दरख़्त की शाखाओ पर
संक्षोभ का आभास न होता !!
सोचो क्या होता
स्रोतस्विनी का जल स्थिर
विक्षोभ अगर न हो उत्पन्न
शबनम क्या होती जाने
यदि आरोहण का प्रताप न होता !!
न तुम होते न हम होते
ये सुन्दर संसार न होता
धन्य हो हे प्राणदायिनी
देकर ये अनमोल धरोहर
प्राकृतिक सौंदर्य स्वरुप
जीवन का कोई आधार न होता !!
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डी. के. निवातियाँ ——!!

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