सोमवार, 18 जनवरी 2016

बदल सा गया है

इस क़दर उदासी इन फ़िज़ाओं मे पहले तो न थी…
इस क़दर बेरूख़ी इन हवाओं मे पहले तो न थी…
ये शाम जिसके आने से कभी दिल खिल उठा था…
इस क़दर खामोश ये पहले तो न थी…..
ये रात जिसका हर लम्हा कभी अपना सा लगा था..
इस क़दर अंजान ये पहले तो न थी….
इक तुम क्या गये ज़िंदगी से “इंदर”…
सब कुछ…………………………. बदल सा गया है…….

Acct- इंदर भोले नाथ…

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here बदल सा गया है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें