इस शहर में दिल के काले है बहुत !
अपने धुन पे गुम मतवाले है बहुत !!
कैसा ये शहर प्यासा भटके पानी को ,
हर गली चौराहों में मैखाने है बहुत !
आज भी गरीबो के पास घर नहीं ,
इस शहर में ऊचीं ईंमारते है बहुत !
चारो – ओर शोरगुल दौड़ रहा शहर ,
हर शख्स अन्जान मुश्किले है बहुत !
यूँ सोचते बैठे न रह चल दौड़ अब ,
सोच लें जाना कहाँ रास्ते है बहुत !
Dushyant kumar patel
Read Complete Poem/Kavya Here इस शहर में (ग़ज़ल)
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