नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,
मेरा जन्मना अभिशाप नहीं
मैं ही तो गृहिणी हूँ ,
मैं हूँ दुर्गा मैं हूँ काली
मैं हूँ लक्ष्मी मैं हूँ सरस्वती ,
मैं महामाया सब मेरी माया
सम्पूर्ण जगत में मैं हूँ छाया ,
नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,
मैं हु इष्ट मैं हूँ नूर
मुझ से कोई नहीं रह सकता दूर ,
मैं हु शून्य मेरे बिना सब सुन
दाएँ बैठू मान बढ़ाऊ बाएँ बैठू मान घटाऊ ,
अच्छे-अच्छों को धुल चटाया
मेरी निति कोई समझ न पाया ,
नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,
हर कामयाबी में मेरा हाथ
मेरे बैगर न पुरुष का पुरुषार्थ ,
मैं अमीना मैं हूँ मरियम
मैं हूँ सीता गीता और सबित ,
अपने से मैं क्या बखान
पढ़ लो आप मेरी इतिहास ,
नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,
सभी पुरुष को मैंने जन्म दिया
इस सृष्टि को सभ्यता संस्कृति और कर्म दिया ,
गम्भीरता सहनशीलता मेरा गुण
इसी लिए लोग करते हैं मेरे साथ भूल ,
प्रेम करुणा का सागर हूँ
सभी गुणों में आगर हूँ ,
नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ।

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