यूँ तो हम हारने वालों मेसे नहीं लेकिन,
प्यार में खानी पड़ती हैं, मातें अक्सर
ज़रा पूछो, गर अश्क पढ़ा हो उसने हमारा,
जो किताबों की करते रहते हैं, बातें अक्सर
दो लफ्जों की गुज़ारिस थी, इक उम्र से उनसे,
जो रकीबों को देते रहते हैं, सौगाते अक्सर
वो जुदा होकर हुए रुसवा, फिर भी ग़म नहीं
दूर होकर ही परखे जाते है, रिश्ते नाते अक्सर
आज भी उस रहगुजर पर शाम कटती है, हमारी
जिस पर, यूँही हो जाती थी मुलाकाते अक्सर
वहाँ फ़र्क क्या पड़ेगा, तुफानो के रुख से,
जहाँ अल्फाजो पे टिकी हो कायनाते अक्सर.
Read Complete Poem/Kavya Here अक्सर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें